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एक ऐसा नाम जिससे दाऊद भी थर थर कापता था बाला साहब ठाकरे

वो बम्बई का बबर शेर था , वो महारष्ट्र का महाराजा था उसकी इजाजत के बिना बम्बई शहर में पता भी नहीं टोलता था , उसकी एक आवाज पर लाखों लोग सड़क पर उतर आते थे ! बड़े बड़े नेता , मंत्री यहाँ तक मुख्यमंत्री भी उसके दरवार में सलाम बजाते थे जिसने मराठी मानुश का मुद्दा उठाया था

लाखों मराठी उनके पिछे बिना कुछ सोचे समझे निकल पड़े जिसने मराठी अस्मिता के सहारे मातोश्री में बैठकर पूरे महारष्ट्र में दशकों तक राज किया ऐसे थे बाल केशव ठाकरे , बाला साहब ठाकरे ! बात 1995 की है मुंबई में हुए साम्प्रदायिक दंगों को हुए काफी वक्त बीत चूका था कई दिनों बाद साउथ के मशहूर फिल्म डायरेक्टर मणि रत्न ने इस पर एक फिल्म भी बनाई थी

इसका नाम रखा गया था बॉम्बे ! इस फिल्म में शिवसैनिकों को मुसलमानों को मारते और लुटते हुए दिखाया गया था फिल्म के अंत में बाल ठाकरे से मिलता जुलता एक करेक्टर इस हिंसा पर अपना दुःख जताता दिखाई देता उसके साथ कई मुस्लिम नेता भी इस तरह के विचार प्रकट करता बाल ठाकरे ने इस फिल्म के प्रदर्शन का विरोध किया और कहा की इसे मुंबई में रिलीज नहीं होने देंगे !

इस फिल्म के डिस्ट्रीव्यूटर थे महानायक अमिताभ बच्चन जो ठाकरे के करीबी दोस्त थे अमिताभ उनके पास गए और पूछा क्या शिव सैनिकों को दंगाई के रूप में दिखाना उन्हें बुरा लगा ? ठाकरे ने जबाब दिया बिलकुल भी नहीं मुझे जो चीज बुरी लगी वो था दंगों पर ठाकरे के चरित्र का दुःख प्रकट करना मैं कभी किसी चीज पर दुःख नहीं प्रकट करता !

अपने 40 साल से भी अधिक राजनितिक जीवन में कोई ऐसा मुद्दा या कोई ऐसा टॉपिक नहीं हुआ करता था जिस पर ठाकरे की कोई राय नहीं हुआ करती थी चाहे नेशनल पॉलिटिक्स हो , या कला या खेल या फिर कोई और विषय ! बाल ठाकरे उस पर टिप्पणी करने से परहेज नहीं करते थे

उनके शब्दों में अक्सर दूसरे का मजाक उड़ाने बाली लाइने होती थी या फिर न काबिले वरदाश की खपत ! करीब 46 साल तक सार्वजनिक जीवन में रहे शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने कभी न तो कोई चुनाव लड़ा , न ही कोई राजनीतिक पद स्वीकार किया यहाँ तक की उन्हें औपचारिक तौर पर भी शिव सेना का अध्यक्ष भी नहीं चुना गया था

लेकिन इन सब के बाबजूद महाराष्ट्र की राजनिति और खास कर राजधानी मुंबई में मुख्यमंत्री भी बिना उनसे सलाह मशवरा किये कोई कदम नहीं उठाते थे यहाँ तक विरोधी भी उनके पास उनसे राय शुमारी के लिए जाया करते थे यानी कुर्सी भले ही किसी के पास हो , कुर्सी की चावी हमेशा बाल ठाकरे के पास हुआ करती थी वो महाराष्ट्र पॉलिटिक्स के गॉड फादर थे ! रिकॉर्डिंग ! देश के विवादित नेता के तौर पर जाने जाने बाले बाल ठाकरे पर कानून तोड़ने के कई आरोप लगे लेकिन ठाकरे की हुंकार कभी कम न हुई !

बाबरी विध्वंस से लेकर दक्षिण भारतीय और उत्तर भारतीय पर हमले के बाबजूद बाल ठाकरे महाराष्ट्र की सत्ता के केंद्र बिंदु बने रहे ! बाल ठाकरे एक सख्त और कटर पॉलिटिशन माने जाते थे दिलचस्प बात यह है कि वो एक कार्टूनिस्ट लेकिन हास्य और व्यंग्य को कला में पिरोने बाला यह शख्स राजनीति में उतना ही कटर माना जाता था

जिसकी आहट से ही बड़े बड़े दिग्गज थरथर कांपने लगते थे ! बाल ठाकरे सचिन तेंदुलकर को बहुत पसंद करते थे लेकिन एक बार जब सचिन ने यह कहा की महाराष्ट्र पर पूरे भारत का हक है तो बाल ठाकरे ने उन्हें आड़े हाथों ले लिया था उन्होंने कहा की सचिन क्रिकेट की पिच पर ही रहें राजनीति का खेल हमें खेलने दें वैसे क्रिकेट का किस्सा आ ही गया है

तो इसी से जुड़ा एक और किस्सा सुन लीजिये ! बाल ठाकरे देश की आन के सामने किसी को तबज्जो नहीं देते थे इसीलिए वो पाकिस्तान से क्रिकेट खेलने के सख्त खिलाफ थे साल 1999 में कई सालों बाद पाकिस्तानी क्रिकेट टीम दो टेस्ट खेलने के लिए भारत आई थी दिल्ली के फीरोजशाह स्टेडियम में पहला टेस्ट होना था

लेकिन बाल ठाकरे को यह बात रास नहीं आई और फिर शिव सैनिकों ने कोटला की पिच ही खोद डाली एक तरफ ठाकरे भारत के पाकिस्तान से क्रिकेट खेलने के सख्त खिलाफ थे वहीँ दूसरी ओर उन्हें पाकिस्तान के बल्लेबाज जाबेद मियांदाद को अपने यहाँ खाने पर बुलाने में कोई गुरेज नहीं था

उन्होंने मियांदाद को अपने घर में खाने पर बुलाया था पुराने पत्रकार बताते है जाबेद मियांदाद ही क्यों अगर इमरान खान भी राजी होते तो वह उन्हें भी अपने यहाँ खाने पर बुला सकते थे ! रिकॉर्डिंग ! साल 2010 की बात है मुंबई हमलों के बाद बाल ठाकरे ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों के आई. पी. एल. में खेलने पर एतराज जताया था

जब कि किंग खान शाहरुख खान इसके खिलाफ खड़े हो गए तब बाल ठाकरे ने शाहरुख़ पर राष्ट्रद्रोही होने का तमगा लगा दिया ! शिवसेना शाहरुख़ से माफ़ी की मांग करने लगी हालाँकि उस वक्त शाहरुख़ खान की फिल्म माई नेम इज खान रिलीज होने बाली थी हालाँकि शिवसेना ने इस फिल्म को लेकर कोई सवाल नहीं उठाया लेकिन शाहरुख़ से माफ़ी की मांग पर अड़ गए

फिर एक दिन कड़ी सुरक्षा के बाबजूद शाहरुख़ के बंगले मन्नत पर हमला हुआ और अगले दिन शाहरुख़ मतोश्री पहुंच गए बाहर निकले तो सबकुछ ठीक होने की बात कहने लगे जो शाहरुख़ एक दिन पहले तक माफ़ी नहीं मांगने पर अड़ रहे थे एक दिन बाद उनके सुर बदल चुके थे समझा जा सकता है

की बाला साहब ठाकरे से मुलाकात के दौरान वहां क्या कुछ हुआ होगा ! बम्बई ब्लास्ट के बाद जब संजय दत्त तालडा के तहत अरेस्ट हो गए थे तब उनके पिता और कांग्रेस के बड़े कदावर नेता सुनील दत्त ने इनकी चौखट पर मदद की गुहार लगाई ! कहते है की आखिरकार वो थक हार कर बाल ठाकरे के पास पहुँच गए और तब जाकर संजय दत्त को तालडा से राहत मिल पाई !

बात घूम फिर कर वहीँ पहुँच गई जिस आदमी ने कभी सीधे तौर पर सत्ता का सुख नहीं भोगा सत्ता हमेशा उसके कदमों में कैसे लोटी रही ! दरअसल यह वो दौर था जब मुंबई में बड़ी बड़ी कंपनियां तो थी लेकिन वहां मराठियों को नौकरी नहीं मिलती थी उनकी जगह दक्षिण भारतीय और गुजरातियों ने ले रखी थी !

बाल ठाकरे तब प्रोफेशनल कार्टूनिस्ट हुआ करते थे वो अपने कार्टून के जरिये मराठियों की आवाज बुलंद करते थे बाद में उन्होंने अखबार की नौकरी छोड़कर मार्मिक नाम से खुद का अपना अखबार निकाला था लेकिन वो समझ गए की मराठी मानुस का यह मुद्दा सिर्फ कार्टून बनाकर हल नहीं होगा !

तब उन्होंने 1966 में शिव सेना नाम से अपनी पार्टी बनाई शिव सेना ने कंपनियों को निशाना बनाना शुरू किया वहां तोड़ फोड़ की जाने लगी बाल ठाकरे का तर्क था की उन कंपनियों में महाराष्ट्र के लोगों को नौकरी मिलनी चाहिए इस मुद्दे को मराठियों ने हाथोंहाथ किया !

शिवसेना की राजनीति में हिंसा और डर बहुत गहरे तक जड़ें जमा चुकी थी ठाकरे कहते थे मैं राजनीति में हिंसा और बल का प्रयोग करूंगा क्योंकि वामपंथियों को यही भाषा समझ आती है और कुछ लोगों को हिंसा का डर दिखाना ही चाहिए तभी वो सबक सीखेंगे !

धीरे धीरे मराठी युवा शिवसेना से जुड़ने लगे दक्षिण भारतियों के कारोबार और प्रॉपर्टी को निशाना बनाया जाने लगा अब अप्रवासी यहां तक की मिडियाकर्मियों पर भी शिव सैनिकों के हमले आम बात हो गई थी ! धीरे धीरे मुंबई के हर इलाके के दबंग युवा शिवसेना में शामिल होने लगे अब एक गॉड फादर की तरह बाल ठाकरे हर झगड़े को सुलझाने लगे लोगों को नौकरियां दिलवाने लगे

यहाँ तक फिल्मों के रिलीज में भी उनकी मनमानी चलने लगी धीरे धीरे मुंबई म्युनिसिपल चुनवों में उनकी पार्टी का प्रदर्शन बेहतर होने लगा हालाँकि शिवसेना का असर मुंबई और उसके आस पास के इलाकों तक ही सिमित रहा और राज्य के दूसरे इलाकों में अब भी पार्टी का कुछ खास असर नहीं था फिर 80 और 90 के दशक का दौर आया जब बाल ठाकरे तेजी से उभरे तो उस समय हिंदुत्व का मुद्दा सर चढ़कर बोल रहा था और ठकरे कटर हिंदुत्व समर्थक थे !

अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराने के बाद मुंबई में साम्प्रदायिक दंगे हुए जो कई हफ्तों तक चले इसमें शिवसेना और बाल ठाकरे का नाम बार बार लिया गया ! तब भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय सेवक संघ ने तो खुलकर जिमेदारी नहीं ली सभी ने कहा उनका इससे कोई लेना देना नहीं है लेकिन जब बाल ठाकरे से जब यह सवाल दोहराया गया तो उन्होंने कहा हमारे लोगों ने गिराया है

और मुझे इसका अभिमान है उन्होंने एक समय यहाँ तक कह दिया था की हिन्दू अब मार नहीं खाएंगे उनको हम अब अपनी भाषा में जबाब देंगे ! बाल ठाकरे जानते थे की ऐसी भाषा से उनको लोगों का समर्थन मिल सकता है और हुआ भी ऐसा ही लोगों के बीच उनके बारे में दिलचस्पी बढ़ने लगी कटर हिंदुत्व और पाकिस्तान को लेकर उनके रवैये की बजह से उन्हें काफी लोगों का समर्थन हासिल हुआ

इसके सिर्फ तीन साल बाद शिवसेना बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने में कामयाब हो गई बाल ठाकरे चाहते थे तो खुद मुख्यमंत्री बन सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया बल्कि अपने एक बहुत ही करीबी नेता को मुख्यमंत्री बनाया और सत्ता की चावी खुद अपने पास रखी ! बाल ठाकरे किंग नहीं किंग मेकर थे

लेकिन आज उनके बारिस उनके उद्धव ठाकरे कांग्रेस एनसीपी गठबंधन के साथ महाराष्ट्र में अपनी सरकार चला रहे है खैर राजनीति की अपनी जरूरतें होती है और वो हमेशा समय समय पर पूरी की जाती है खैर जैसा भी हो बाल ठाकरे की अंतिम विदाई में शामिल होने पूरा मुंबई पहुँच गया था ऐसा जनसैलाब उमड़ा था किसी ने जो कभी नहीं देखा था ! उन्हें 21 तोपों की सलामी दी गई थी जो प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को ही दी जाती थी ऐसे थे बाला साहब ठाकरे !

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